Sankhya philosophy hindi | सांख्य दर्शन का सार

हिंदी में सांख्य दर्शन का सार-

भारतीय दर्शन में सांख्य दर्शन प्राचीनतम दर्शन है। इस दर्शन के प्रवर्तक "महर्षि कपिल" है। आचार्य गौतम बुद्ध ने भी सांख्य दर्शन का अध्ययन किया। क्योंकि उनके गुरु आलार कलाम सांख्य दर्शन के विद्वान थे। उन्होंने गौतम बुद्ध को सांख्य का उपदेश दिया। जिससे उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ और वह घर त्याग कर चले गए।

सांख्य दर्शन मुख्यतः दो (2) तत्वों को मानता है। 1. प्रकृति 2. पुरुष। इन दो तत्वों से ही सांख्य दर्शन के अन्य (23) तत्वों की उत्पत्ति होती है। सांख्य में प्रकृति को अचेतन कहा गया है और वहीं पुरुष को चेतन। जब पुरुष का प्रतिबिंब (छाया) प्रकृति के ऊपर पड़ता है। तब सृष्टि प्रक्रिया आरंभ होती है। यह सांख्य दर्शन का मत है। 

Sankhya philosophy in hindi
सांख्यदर्शन में तत्त्व


सांख्य दर्शन में 25 तत्व हैं। इन तत्वों का सम्यक् ज्ञान जीव को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करता है। सांख्य का अर्थ ही है- तत्वों का ज्ञान। जिससे जीव मुक्ति पा सके। गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने सांख्य दर्शन का उपदेश अर्जुन को दिया। सांख्य दर्शन के विभिन्न आचार्य हुए। लेकिन आज के समय में सांख्य दर्शन का जो प्रामाणिक ग्रंथ मिलता है। वह ग्रन्थ है- "सांख्य-कारिका"। इसका श्रेय आचार्य ईश्वर कृष्ण को जाता है।

ईश्वर कृष्ण ने अपनी सांख्यकारिका में आचार्य कपिल के सूत्रों (सांख्यसूत्र ) को कारिका बद्ध करके पाठकों के लिए सहज और अर्थ दृष्टि से भी सरल बनाया है। सांख्य-कारिका विभिन्न लेखकों, संपादकों द्वारा रचित है। लेकिन डॉ. विमला कर्नाटका द्वारा लिखित सांख्य-कारिका प्रचलित तथा बोधगम्य है।



सांख्य के २५ तत्वों का विवरण -

सांख्य दर्शन में क्रमशः 25 तत्त्व माने गए हैं। पच्चीस तत्त्व हैं- प्रकृति, पुरुष, महत् (बुद्धि), अहंकार, पंच ज्ञानेन्द्रिय (चक्षु, श्रोत, रसना, घ्राण, त्वक्), पंच कर्मेन्द्रिय (वाक्, पाद, पाणि, पायु, उपस्थ), मन, पंच- तंमात्र (रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श) पंच-महाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश)। अधिक जानकारी के लिए चित्र को अवश्य देखें।

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सांख्य-दर्शन 25 तत्त्व


सांख्य दर्शन सूत्र बद्ध होने की वजह से पढ़ने में कठिन था। लेकिन उसका कारिकाबद्ध होने से पढ़ने में सुविधा हुई। जब तक सांख्य दर्शन सूत्रों में था, तब तक उसे कुछ विद्वान ही पढ़ पाते थे। लेकिन सूत्र से कारिका और कारिका से तत्त्व-कौमुदी के विकास ने सांख्य दर्शन को जीवित कर दिया और उसको अनेक विद्वान व छात्र सहर्ष पढ़ने लगे।

आचार्य वाचस्पति मिश्र ने "सांख्यतत्त्व-कौमुदी" में बड़े ही विस्तृत से सांख्य दर्शन के तत्त्वों का वर्णन किया और साथ ही आचार्य परंपरा सांख्य सिद्धांत आदि का वर्णन किया गया। युक्त-दीपिका में भी पाठकों को सांख्य का समस्त ज्ञान पढ़ने को मिल जाता है।


सांख्य दर्शन का प्रमुख सिद्धांत -

सांख्य का मुख्य सिद्धांत सत्कार्यवाद है। जिससे सत् से सत् की उत्पत्ति आदि पांच हेतु माने गए हैं। सांख्य दर्शन ईश्वर को नहीं मानता, इसीलिए इसे निरीश्वरवाद भी कहते हैं। यह दर्शन पुरुष को आत्मा और प्रकृति को माया आदि नामों से पुकारा जाता है।

सांख्य दर्शन का सर्वोत्कृष्ट तत्त्व बुद्धि को माना गया है। जिसे हम महत् के नाम से भी जानते हैं। क्योंकि बुद्धि के द्वारा ही हमें सत्य और असत्य का भान होता है। इसीलिए इसे विवेकी भी कहा गया है। सांख्य में बुद्धि के 8 धर्म बताए गए हैं- धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य एवं अनैश्वर्य। बुद्धि के यह 8 धर्म ही मनुष्य को सद्गति व अधोगति की ओर ले जाने का कार्य करते हैं।

सद्गति से तात्पर्य है मोक्षादि और अधोगति से तात्पर्य है- जन्म- मरण के बंधन में बंधते रहना। सांख्य दर्शन में 3 गुण माने गए हैं। सत्व, रज, तम। इन तीन गुणों का विशेष महत्व है। क्योंकि हर जीव में इन तीनों गुणों का होना पाया जाता है। कोई भी जीव इन तीन गुणों से अछूता नहीं है। जिस जीव में जिस गुण की बाहुल्यता अर्थात् अधिकता पाई जाती है। वह उसी प्रकार का आचरण/व्यवहार करता है। 

उदाहरण के लिए अगर कोई जीव या मनुष्य पूजा-पाठ वैदिक मंत्र, दान, जप आदि करता है। तो उसमें सतोगुण की बाहुल्यता के साथ प्रकाशमय, तेजोमय रहता है। अगर किसी जीव में रजोगुण के लक्षण हैं- तो वहां चंचलता, अति शीघ्र निर्णय लेने वाला आदि कार्य करना। इसके विपरीत अगर कोई जीव/मनुष्य क्रूरता, पाप, दूसरों पे क्रोध, द्वेष आदि कार्य में संलग्न रहता है। तो उसमें तमोगुण की बाहुल्यता है। ये तीन गुण काल परिस्थिति पर भी निर्भर करते हैं। जीव जिस परिवेश में रहेगा, उसमें उसी गुण की अधिकता पाई जाएगी।


सांख्य दर्शन शास्त्र में मुक्ति -

सांख्य दर्शन में दो प्रकार की मुक्ति बताई गई है। 1. देह-मुक्ति 2. विदेह-मुक्ति। देह-मुक्ति का तात्पर्य है- शरीर की मुक्ति और विदेह-मुक्ति से तात्पर्य है- जन्म-मरण प्रक्रिया से सदैव के लिए मुक्ति वा सूक्ष्म शरीर की मुक्ति।

सांख्य दर्शन को विभिन्न भारतीय दर्शनों में यत्र-तत्र सर्वत्र पढ़ा जा सकता है। श्रुति लेखानुसार- सभी दर्शनों की उत्पत्ति सांख्य दर्शन से मानी गई है। सर्व प्राचीन दर्शन होने का गौरव सांख्य दर्शन को ही प्राप्त है। 


सांख्य मतेन अहंकार भेद -

सांख्य दर्शन में अहंकार को दो भागों में बांटा गया है। 1. सात्त्विक अहंकार 2. तामसिक अहंकार। 

सात्त्विक अहंकार 11 प्रकार का है। ( पंचज्ञानेन्द्रिय- चक्षु, श्रोत, रसना, घ्राण, त्वक्। पंचकर्मेन्द्रिय - वाक्, पाद, पाणि, पायु, उपस्थ, मन ) ।  

तामसिक अहंकार 10 प्रकार का है। ( पंच-तंमात्र- रुप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श। पंच-महाभूत- पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश )। 

राजसिक अहंकार को उभयात्मक कहा गया है। उभयात्मक का अर्थ होता है- जिसकी मात्रा या बहुलता अधिक हो उसी के सदृश हो जाना। इसके साथ मन को भी उभयात्मक माना गया है।

सांख्य दर्शन का आज के समय में बहुत ही पुस्तकें प्राप्त हैं। लेकिन सांख्यकारिका एवं सांख्य दर्शन का इतिहास अन्य पुस्तकों में सांख्य दर्शन को 10वीं - 11वीं शताब्दी का माना गया है। आचार्यों के भिन्न-भिन्न मत हैं। लेकिन सभी आचार्यों ने इस दर्शन को प्राचीन मानने में सम्मति दिखाई है। 25 तत्त्व होने के कारण इस दर्शन को सांख्य दर्शन कहा गया है। क्योंकि सांख्य का अर्थ ही होता है- संख्याओं की गणना करना। अतः इसी गणना के आधार पर इस दर्शन का नाम सांख्य दर्शन पड़ा। 

ध्यान दें - अगर किसी को सांख्य-दर्शन से सम्बंधित किसी भी प्रकार की जानकारी या फिर किसी भी प्रकार की दिक्कत हो अथवा कोई जिज्ञासा हो। तो हमसे संपर्क कर सकते हैं। समस्या का उचित समाधान किया जायेगा। हमसे संपर्क के लिए कांटेक्ट अस फॉर्म भरें। या यहाँ क्लिक करें। या  फिर contact@hindibestblog.com पे मेल कर सकते हैं।  धन्यवाद। 

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